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रविवार, 15 मई 2011

प्रेम विवाह ही बेहतर हल है दहेज दानव का

र्तमान भारत अनेक सामाजिक कुरीतियों से ग्रसित है. इनमें से एक है -दहेज प्रथा  जो भारत के बहुत से राज्यों में प्रचलित है. दहेज प्रथा आज एक सामाजिक अभिशाप का रूप धारण कर चुकी है .दहेज का प्रचलन  हमारे देश में वैदिक काल से ही चला आ रहा है, किन्तु उस समय दहेज पुत्री के विवाह के उपरांत उसकी नयी गृहस्थी को बसने हेतु एक सहयोग एवं परिजनों के प्रेम का प्रतीक मात्र था. किन्तु शनैः शनैः इस प्रथा का विकृत रूप सामने आने लगा. स्वेच्छा से दिया जाने वाला यह उपहार कन्या-पक्ष के लिए एक अनिवार्य नियम सा बन गया. आधुनिक भौतिकवादी युग में तो दहेज के बिना लड़की के विवाह की कल्पना भी असंभव प्रतीत होती है. 
कुछ राज्यों में जैसे -यू.पी . एवं बिहार में तो स्थिति इतनी गंभीर  है कि विवाह से पूर्व दहेज में दी जाने वाली नकद राशि, आभूषण, एवं अन्य  सामानों कि विधिवत सूची बना ली जाती है. दहेज का निर्धारण वर कि पारिवारिक पृष्ठभूमि एवं उसके पद के आधार पर होता है. लड़के का पिता अपने पुत्र कि शिक्षा में व्यय हुए धन कि वसूली दहेज से करना चाहता है. सबसे बुरी बात तो यह है कि  दहेज को सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया जाता है. जिसे जितना अधिक दहेज मिले वह उतना ही अधिक समृध्द एवं प्रतिष्ठित समझा जाता है. यहाँ तक कन्या पक्ष में भी यह चर्चा होती है कि किसने अपनी  बेटी को अधिक दहेज दिया जिसका परिणाम यह होता है कि वर पक्ष में अधिक से अधिक दहेज प्राप्त करने कि होड़ लग जाती है.
 दहेज प्रथा का सबसे बड़ा कुपरिणाम यह है कि आज लड़की के जन्म को अभिशाप समझा जाने लगा है ,जिससे कन्या भ्रूण-हत्या तथा लिंगानुपात में विषमता स्पष्ट देखी जा सकती है .माता -पिता बेटी के जन्म से ही उसके विवाह के लिए दहेज -राशि एकत्र करने में लग जाते हैं .इसका एक मुख्य कुप्रभाव लड़कियों कि शिक्षा पर भी देखा जा सकता है उनके लिए उच्च शिक्षा पर व्यय करने कि अपेक्षा दहेज पर व्यय किया जाना बेहतर समझा जाता है .यदि लड़की के अभिभावक येन-केन प्रकारेण दहेज दे भी  देते है तो कुछ वर्षों के लिए वे आर्थिक रूप से पंगु हो हो जाते हैं .कई बार..  तो उन्हें दहेज के लिए ऋण तक लेना पड़ता है.
यदि कोई लड़की अधिक अवस्था तक अविवाहित रहती है तो उसके परिजनों को भले कोई समस्या न हो दूसरे लोगों कि चर्चा का विषय बन जाती है .भारत में विवाह एक संस्कार मन जाता है तथा पुत्री का विवाह करना माता -पिता का पुनीत कर्तव्य माना जाता है .हमारे देश में यदि कोई सुशिक्षित लड़की आजीवन अविवाहित रहना चाहे तो उसे हेय और शंकित दृष्टि से देखा जीता है. हमारे समाज में विवाह  एक अनिवार्यता है वर पक्ष इसका अनुचित लाभ  उठता   है. दहेज प्रथा के विस्तार का मुख्य कारण है वर चयन का अत्यधिक सीमित क्षेत्र होना. भर्तीव समाज अनेक धर्म, वर्ण, जातियों एवं उपजातियों में विभक्त है तथा यहाँ प्रायः सजातीय विवाह का ही प्रचलन है. अतः वर चयन का क्षेत्र अत्यंत सीमित हो जाता है .
यदि अभिभावक माँग के अनुरूप दहेज नहीं दे पाते हैं तो विवाह के बाद लड़की को अनेक प्रकार की शारीरिक तथा मानसिक प्रताडनाओं से गुजरना पड़ता है ,घरेलू हिंसा का शिकार होना पड़ता है. कई बार लड़की को मार दिया जाता है या उसे आत्महत्या करने पर विवश कर दिया जाता है. परिवार में जो वधू अधिक दहेज लेकर आती है उसे सम्मान कि दृष्टि से देखा जाता है. दहेज की माँग विवाह तक ही समाप्त नहीं  होती अपितु विवाह के बाद भी अनेक उत्सवों एवं समारोहों पर मूल्यवान उपहारों कि माँग निरंतर जारी रहती है. कई निर्धन अभिभावकों को दहेज के आभाव में  अपनी योग्य पुत्रियों का  विवाह अनुपयुक्त लड़कों से करना पड़ता है तथा इस प्रकार समाज में अनमेल विवाहों कि वृध्दि होती है तथा लड़की का जीवन सदैव दुःख में व्यतीत होता है.
 यद्यपि दहेज के विरुध्द कानून 1961 में ही बन गया था जिसके अनुसार दहेज लेना कानून अपराध घोषित किया गया है एवं ऐसा करने वाले को आर्थिक दंड ,कारावास  तथा पीड़ित की म्रत्यु कि स्थिति में मृत्युदंड तक ता प्रावधान है .किन्तु जब तक हम स्वयं सचेत एवं कटिबध्द नहीं होंगे तब तक कानून भी निष्प्रभावी सिध्द होगा. अतः सबसे आवश्यक है कि लड़कियों को उच्च शिक्षा प्राप्त करने एवं स्वावलंबी बनने का पूरा अवसर प्रदान किया जाय ,जिससे वे लड़कों एवं समाज के समक्ष आत्मविश्वाश के साथ खड़ी हो सकें. इससे वर पक्ष की ओर से दहेज माँग कि संभावना काफी कम हो जाती है. तदुपरांत वर चयन के क्षेत्र  को और अधिक विस्तृत किया जाना चाहिए. अंतरजातीय विवाह तथा प्रेम विवाह को प्रोत्साहित करना चाहिए ,समाज में इन्हें हेय दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए. दहेज प्रथा के उन्मूलन में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका युवाओं कि है. युवा दहेज के विरुध्द एकजुट होकर स्थिति में काफी परिवर्तन ला सकते हैं .स्वयं भी दहेज न लेकर वह दूसरों को प्रेरित कर सकते हैं.
यदि हम दृढ़ निश्चय कर लें तथा निरंतर प्रयास करते रहें तो निश्चय ही दहेज कुप्रथा समाप्त हो सकती है.

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