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गुरुवार, 14 जुलाई 2011

कब तक सहेंगे मुंबई पर हमले?


शैलेष जायसवाल/ मुंबई
   आखिरकार हर बार की तरह कायर दुश्मनों ने देश की आर्थिक राजधानी मुंबई को एक बार और निशाना बनाया। पिछले दो दशकों से मुंबई धमाकों से दहलता रहा है। अब तक सैकड़ो लोग इन धमाकों में अपनी जान गंवा चुके हैं और हजारों घायल हुए हैं। कईयों के तो परिवार भी उजड़ गए हैं, जो अबतक सदमे से बाहर नहीं आ पाए है। उसी जख्म पर मरहम छिड़कते हुए कमीनों ने एक और हमला बोल कर हिंदुस्तानियों की मर्दानगी को ललकारा है। मुंबई पर अबतक का यह १० वा आतंकी हमला है।
कसाब को पाल कर सरकार ने जो दोगलेपन और गद्दारी का सबूत दिया है। उसी पर मुहर लगाते हुए गिदड़ की औलादों ने १३ जुलाई को कसाब के जन्मदिन पर देश को एक और खौफनाक मौतों का तोहफा दे दिया। इसके बावजूद राहूल गांधी का यह बयान ’ आतंक को रोकना नामुमकीन है’ लोगों को अचरज में डाल कर जनता के क्रोध को आमंत्रण दे रहा है। दुनिया जानती है कि अमेरीका पर हमला करनेवालों के घर में घुस कर अमेरीकी सरकार अपना बदला ले लेती है। तो फिर भारत में ही ऐसा क्यों?
   हमले के तुरंत दूसरे दिन बाद काम पर जाकर मुंबईकरों ने इस बात का जवाब तो दे दिया कि वे आतंक से डरे नहीं। मगर फिर भी आम मुंबईकर इस बात का जवाब मांगने लगे है कि आखिर मुंबई की किस्मत में और कितने आतंकी हमले लिखे हैं? न जाने देश की आर्थिक राजधानी को किसकी बुरी नजर लग गई है। कब तक घायल होती रहेगी मुंबई? क्या हर बार मुंबईकर और देशभर में मोमबत्ती मार्च निकाल कर हम अपना विरोध प्रदर्शन करते रहेंगे।
   १३ जुलाई की शाम मुंबई में दादर, झवेरी बाजार और ओपेरा हाउस में जो विस्फोट हुए उसने यह साबित कर दिया कि २६/११ के हमलों के बाद भी सुरक्षा-व्यवस्था में चूक है और इसी का फायदा उठाकर देर शाम भीड़ भरे माहौल में तीन विस्फोट किए गए हैं।
   बता दे कि विभिन्न धर्म और समुदायों, भिन्न संस्कृतियों वाले इस विशाल देश के अधिकांश हिस्से इस समय किसी न किसी रूप से हिंसा से ग्रस्त रहा हैं। प्राचीन और गौरवशाली इतिहास वाले इस देश के कई भाग कहीं आतंकवादी हिंसा से तो कहीं नक्सलवाद तो कहीं क्षेत्रवाद की लड़ाई के चलते लहूलुहान हैं।
   मुंबई में १३ जुलाई को हुए बम धमाकों ने न केवल सुरक्षा खामियों पर सवाल उठाए बल्कि सरकार की नीतियों को भी कठघरे में खड़ा कर दिया है। २६/११ के बाद सुरक्षा के तमाम दावों की बुधवार को हुए धमाकों से धज्जियां उड़ गई। क्या इतने बड़े आतंकी हमले पर कोई खुफिया सूचना नहीं थी। उस पर से गृहमंत्री का यह बयान 'यह हमला खुफिया तंत्र की नाकामी नहीं' जनता के आक्रोश को और भी बढ़ा रहे हैं। सबसे ज्यादा गुस्सा तो इस बात का आ रहा है कि सुरक्षा बल अपनी जान पर खेल कर जिन आतंकियों को पकड़ने में सफल हो जाते हैं, उनको अभी तक सजा सुनाए जाने के बाद भी सरकारी मेहमान बनाकर रखा गया है।
गौरतलब है कि दिल्ली में १९९३ विस्फोट के दोषी खालिस्तानी आतंकी देवेन्द्रपालसिंह भुल्लर की दया याचिका कई साल तक लटकी रही थी और फिर राष्ट्रपति ने इसे खारिज कर दिया थी। भुल्लर की दया याचिका पर फैसला सुप्रीम कोर्ट की पहल के बाद आया। सुप्रीम कोर्ट ने भी भुल्लर की दया याचिका को ८ साल लटकाने पर हैरत जताई।
    २००१ में संसद पर हमला करने वाले अफजल गुरू को ४ अगस्त २००५ को फांसी की सजा सुनाई जा चुकी है। मगर मामले में देरी क्यों हो रही है यह सभी की समझ से परे है। मुंबई में २६/११ का आतंकी हमला करने वाला पाकिस्तानी आतंकवादी अजमल कसाब को बॉम्बे हाई कोर्ट ने चार मामलों में फांसी की सजा बरकरार रखी है, लेकिन इसके बावजूद उसे फांसी देने में अभी भी कम से कम १० साल का वक्त लग सकता है। कानून के जानकार मानते हैं कि इस मामले में अभी भी कई कानूनी उलझने हैं। कसाब अपनी फांसी को टालने के लिए सुप्रीम कोर्ट से लेकर राष्ट्रपति का दरवाजा भी खटख़टा सकता है।
   सरकार के इस रवैय्ये और भारत के इस कानून के होते हुए न्याय के इंतजार में हिंदुस्तानियों को केवल मायूसी के अलावा कुछ नहीं मिलने वाला। यह लंबित प्रक्रिया सुरक्षाबलों का मनोबल तोड़ने वाली है। भ्रष्ट नौकरशाहों, घोटालों से घिरी सरकार और लालची नेताओं के होते तो हम इन देश के दुश्मनों को पालते रहेंगे और आतंकियों को पालने वाले देश यूं ही धमाकों से दहलते रहेंगे...। अगर ऐसा ही रहा तो एक दिन खुद आक्रोशित जनता को इसका पैâसला लेना होगा। भीड़ को इकट्ठा होकर जेल में घुस कर कसाब और अफजल जैसे कायरों को मिटाना होगा। ताकि दुनिया देखे कि हिन्दुस्तान को चोट पहुंचानेवालो का क्या हश्र होता है?
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हमले १३ और २६ तारीखों को ही क्यों?
   गौर करनेवाली बात तो यह है कि आतंकवादियों ने भारत में धमाकों के लिए १३ और २६ तारीख को ही चुना। यही नहीं, अब तक धमाके के लिए शाम ६ से ७ बजे के वक्त को ही चुना। बुधवार को भी १३ तारीख थी और तीनों धमाके शाम ६ से ७ के बीच हुए हैं। बता दें कि इससे पहले १३ और २६ तारीख को अहमदाबाद और दिल्ली में धमाके हुए थे। इस बार भी हुए धमाकों का पैटर्न भी इंडियन मुजाहिदीन द्वारा पहले कराए गए धमाकों से मिलता-जुलता है। २००८ में जयपुर में १३ मई को बम धमाके हुए थे। उसी साल २६ जुलाई को अहमदाबाद में बम ब्लास्ट हुए थे। उसके बाद १३ सितंबर को दिल्ली बम ब्लास्ट का निशाना बनी, जबकि उसी साल २६ नवंबर को मुंबई में देश का सबसे बड़ा आतंकवादी हमला हुआ था। आँकड़ों पर गौर करें तो १३ फरवरी २०१० को एक बार फिर आतंकवादियों ने पुणे को धमाके के लिए चुना था।
तारीख                       जगह                             मृत        घायल
२६ नवंबर २००८    सीएसटी, जीटी,
                             विलेपार्ले, जोगेश्वरी              १६६          २४०   
११ जुलाई, २००६    शहरभर में
                          ७ लोकल ट्रेनों में
                          ७ स्थानों पर विस्फोट             १८१         ८९०
२५ अगस्त, २००३    गेटवे ऑफ इंडिया
                              और झवेरी बाजार               ५०         १५०
२९ जुलाई २००३     घाटकोपर                             ३           ३४
१४ अप्रैल, २००३    बांद्रा                                     १             ०
१३ मार्च, २००३      मुलुंड रेलवे स्टैंशन               ११           ८०
२७ जनवरी, २००३     विले पार्ले                         १           २५
६ दिसंबर, २००२    मुंबई सेंट्रल रेलवे स्टेशन       ०           २५ 
२ दिसंबर, २००२    घोटकोपर                             ३           ३१
२७ फरवरी, १९९८    विरार                                 ९            ०
२४ जनवरी, १९९८    मलाड़                               ०             १
२८ अगस्त, १९९७    जामा मस्जिद के पास       ०             ३
१२ मार्च, १९९३        शहरभर में
                              १३ विस्फोट                     २५७        ७१३
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