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शनिवार, 12 सितंबर 2015

शिवसेना को समर्थन के बाद उत्तरभारतीयों मिला ठेंगा


(अजय शर्मा )
 मुंबई में लोकसभा और विधानसभा चुनाव के बाद उत्तरभारतीय नेता खुद को ठगा सा महसूस करने लगे हैं। चुनाव के दौरान कई राजनैतिक पार्टियों ने उत्तरभारतीय नेताओं को जीत हासिल होने पर महत्वपूर्ण पद देने का वादा किया था। खासतौर पर शिवसेना और भाजपा में महत्वपूर्ण पद पाने के लालसा में नेताओं ने उन्हें भारी जीत तो दिला दी, मगर अभी तक पद के नाम पर उन्हें केवल लॉलीपॉप ही थमा दिया गया। इस वजह से शिवसेना व भाजपा के कई उत्तरभारतीय नेता नाराज दिखाई दे रहे हैं। 
     हालांकि उनकी नाराजगी भी जायज है । गौरतलब है कि हाल के विधानसभा चुनाव में शिवसेना को समर्थन देना उत्तरभारतीय संघ में भी घमासान का कारण बन गया है। संघ मुंबई में रहनेवाले करीब ३५ लाख उत्तरभारतियों की प्रतिनिधि संस्था मानी जाती है। वहीं दूसरी ओर शिवसेना उत्तरभारतीय मंच के अध्यक्ष कैलाशनाथ पाठक ने सांसद गजानन किर्तीकर एवं महाराष्ट्र के गृह निर्माण राज्यमंत्री रविंद्र वायकर समेत अंधेरी के रमेश लटके के पाले में उत्तर भारतीयो के वोट डालने में एड़ी चोटी का जोर लगाया था। हालांकि इन दोनों के जीत में उत्तरभारतीय वोट निर्णायक साबित हुए। शिवसेना में उत्तरभारतीयों का मंच बनने और  कैलाशनाथ पाठक के हाथों कमान देने के बाद उत्तर भारतीय लोगों का शिवसेना ओर देखने का नजरिया बदलने लगा था। साथ ही पाठक ने शिवसेना के लिए विशाल उत्तर भारतियों को समर्थन भी जुटा लिया  था। मगर शिवसेना में मराठीवाद के चलते  कैलाशनाथ  पाठक को कोई खास तवज्जो नहीं मिल पा रही है।  इस वजह से पाठक के समर्थक भी पार्टी से नाराज है। 
      दूसरी ओर देखा जाए तो पिछले विधानसभा चुनाव में उत्तरभारतीय संघ के अध्यक्ष आर.एन.सिंह अपने पुत्र संतोष सिंह को शिवसेना से एवं भतीजे अमरजीत सिंह को भाजपा से टिकट दिलवाने में सफल रहे थे। ये दोनों उम्मीदवारियां मुंबई के दो नामचीन उत्तरभारतीय नेताओं क्रमश: मोहममद आरिफ नसीम खान एवं कृपाशंकर सिंह के विरुद्ध हासिल की गई थीं। आर.एन.सिंह के परिवार के इन दोनों सदस्यों को चुनाव में मुंह की खानी पड़ी, लेकिन उत्तरभारतीय मतों में बंटवारे के कारण पूर्व मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष कृपाशंकर सिंह को हार का मुंह देखना पड़ा। चुनाव के दौरान प्रमुख उत्तरभारतीय नेताओं की ही जड़ खोदना अब उत्तरभारतीय संघ के अध्यक्ष आर.एन.सिंह को भारी पड़ रहा है।
      चुनाव के दौरान आर.एन.सिंह ने उत्तरभारतीय संघ द्वारा शिवसेना को समर्थन देने की घोषणा कर दी थी। अब संघ के कार्याध्यक्ष शारदा प्रसाद सिंह सहित कार्यकारिणी के दो दर्जन से ज्यादा सदस्यों ने संघ के अध्यक्ष सिंह को पत्र लिखकर सवाल उठाया है कि विधानसभा चुनाव के दौरान शिवसेना को समर्थन देने की अपील किस आधार पर जारी की गई थी। वहीं शिवसेना के मुखपत्र ’दोपहर का सामना’ के कार्यकारी संपादक प्रेम शुक्ल ने हर शिवसेना नेताओं का मंच पर प्रचार प्रसार जमकर किया था। मगर उन्हें भी शिवसेना ने केवल अखबार निकालने तक ही सीमित रखा और आगे बढने का मौका नहीं दिया।  इस कारण उनकी नाराजगी भी जायज है।  हालांकि ऐसा माना जा रहा था कि चुनाव के बाद प्रेम शुक्ल को राज्यसभा की सीट दी जाएगी। मगर ऐसा न होने से उत्तरभारतीय असंतोष हो गए। 
       मुंबई में उत्तरभारतियों की सबसे बड़ी शिक्षण संस्था झुनझुनवाला काले के ट्रस्टी डॉ.राजेंद्र सिंह सवाल उठाते हैं कि जिस शिवसेना की बुनियाद ही उत्तरभारतियों के विरोध पर टिकी रही हो, चुनाव में उसे उत्तरभारतियों की प्रतिनिधि संस्था का समर्थन क्यों दिया जाना चाहिए। मुंबई के उत्तरभारतियों को यह चिंता भी सता रही है कि संघ के अध्यक्ष के शिवसेना में शामिल होने के बाद कहीं संघ पर शिवसेना का झंडा न फहराने लग जाए। जबकि संघ की कार्यकारिणी में सभी दलों के लोग शामिल रहे हैं।

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