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रविवार, 25 अक्तूबर 2015

देश में सही न्यायव्यवस्था के लिए ’पारदर्शी एवं न्याय बिल २०१५’ का प्रस्ताव




कु. हीना शेख / मुंबई )

एक फर्जी बलात्कार के आरोप में सात साल की सजा जेल में पूरी करने के तीन महीने बाद मुंबई हाईकोर्ट ने जहां गोपाल शेट्टे को निर्दोष साबित कर बाइज्जत बरी कर दिया वहीं गोपाल की तरह कोई अन्य व्यक्ति कानून के अन्याय का शिकार न बने इसको लेकर ऑर्गनाइजेशन ऑफ़ जस्टिस फॉर ह्यूमैनिटी अवेर्नेस (ओझा ) नामक एनजीओ अब पारदर्शी एवं शीघ्र न्याय बिल २०१५ लाने की कवायद में जुट गई है। ओझा के संस्थापक एंड नीलेश ओझा का आरोप है कि कानून के रखवाले ही कानून के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। ऐसे में अधिकांश मामलों में दोषी व्यक्तियों को जहां कानूनी संरक्षण प्राप्त होता हैं, वहीं कितने ही निर्दोशों का बेवजह कानूनी शिवंâजे में पंâसने के कारण उनका जीवन बरबाद हो जाता है, ऐसा आगे किसी अन्य के साथ न हो,इसके लिए ओझा एनजीओ  पारदर्शी एवं शीघ्र न्याय बिल का प्रस्ताव सरकार के संज्ञान में लाकर लोकसभा में पेश कराना चाहती है ताकि लोगों को सही न्याय मिलने में हर संभव मदद मिल सके। 
बता दें कि गोपाल शेटे पर बलात्कार का आरोप लगा था और उसे सात साल की सजा भी भुगतनी पड़ी। इस बदनुमा आरोप के बाद अपना सब कुछ गंवा चुके गोपाल हाईकोर्ट के आदेश के बाद अपने पुनर्वसन के लिए हाईकोर्ट में सरकार से २०० करोड़ रूपये मानहानि का दावा किया है। गोपाल की ओर से याचिका दायर करनेवाले एडवोकेट निलेश ओझा ने दोषी कुर्ला रेल्वे पुलिस एवं सत्र न्यायाधीश के खिलाफ भी सख्त कार्रवाई की मांग की है। 
हाईकोर्ट ने माना कि नाम की गलती की वजह से आरोपी गोपी की जगह गोपाल शेटे को धोखे से बली का बकरा बनाया गया। गौरतलब है कि अपनी गरीब परिस्थिति के चलते गोपाल खुद को निर्दोष साबित करने के लिए कोई वकील नियुक्त नहीं कर सका।  इस वजह से सत्र न्यायालय ने गोपाल को ७ साल की सजा सुना दी।  मगर फिर  भी जेल में हिम्मत न हार कर गोपाल ने जेल के अंदर ही अपनी पढाई करते हुए खुद को निर्दोष साबित करने के लिए २०१० में हाईकोर्ट में याचिका दायर की और खुद ही अपनी वकालत की।  जेल के अंदर से ही लगभग ४० से भी ज्यादा सूचना अधिकारों (आरटीआई ) के तहत जानकारिया मंगाकर मिले मजबूत सबूतों के आधार पर गोपाल ने खुद को तो निर्दोष साबित कर ही दिया। मगर हाईकोर्ट की जब सुनवाई हुई तब तक गोपाल की सजा पूरी होकर तीन महीने से भी ज्यादा गुजर चुके थे।  
एडवोकेट निलेश ओझा के मुताबिक देश के कुछ भ्रष्ट न्यायाधीश भी कानून और न्यायपालिका को खोखला कर रहे हैं। अक्सर दंबगों के साथ मिलकर निर्दोषों को कानूनी शिवंâजे में पंâसाया जा रहा है। ऐसे में मजबूर व्यक्ति केवल न्यायाधीशों की तानाशाही का शिकार होकर रह जाते हैं। एंड. नीलेश ओझा का कहना है कि पारदर्शी एवं शीघ्र न्याय बिल २०१५ कानून के पास होने पर सभी अदालतों में सीसीटीवी वैâमेरे लगने से न्यायव्यवस्था में पारदर्शिता आयेगी। इस कानून की वजह से कोई भी तानाशाह न्यायाधीश अपनी मनमानी नहीं कर पाएगा। संविधान में सबके लिए समान न्याय होगा। इस कानून के लागू होने पर दोषी न्यायाधीशों पर कार्रवाई के लिए स्पेशल अदालतें व विशेष पुलिस विभाग होंगे। साथ ही दोषी पुलिस अधिकारी के खिलाफ शिकायतों की जांच के लिए विशेष पुलिस थाने रहेंगे। इस वजह से अधिकारी भी गलत काम करने से कतरायेंगे। एडवोकेट ओझा ने बताया कि झूठे सबूतों के आधार पर किसी निर्दोष को सजा देने के आरोप में भादस की धारा २११, २२० तथा १९४ के तहत पुलिस और न्यायाधीश को कम से कम ७ साल की सजा होनी चाहिए।  ओझा के मुताबिक उनके एनजीओ के माध्यम से वे ऐसे ही असहाय कानून पीड़ित लोगों की मदद करते हैं तथा लोगों को कानूनी जानकारियां देकर उन्हें खुद अपनी वकालत करने के लिए प्रेरित किया जाता है।  
उक्त बिल में दिए प्रस्ताव के मुताबिक हर पुलिस थाने में शिकायतकर्ता का वीडियो रिकॉर्डिंग होना जरूरी है। हर सरकारी अधिकारी, न्यायाधीश, नेता, मंत्री एवं दबंगों के खिलाफ किसी की भी शिकायत हर पुलिस थाने में बिना किसी पूर्व अनुमति के ली जा सकेगी। प्रलंबित मामलों को जल्दी निपटाने के लिए न्यायाधीशों की संख्या बढाई जाए तथा न्यायालयों में हर मामलों का निपटारा महज छह माह से एक साल के भीतर होना जरूरी होगा। वहीं एक साल के ऊपर चलनेवाले मामलों का पर्याप्त कारण न्यायाधीश को देना होगा अन्यथा दोषी न्यायाधीश पर कार्रवाई होगी।

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